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एक पेड़ माँ के नाम… बाकी पेड़ आने वाली पीढ़ियों के नाम” क्या विकास और पर्यावरण साथ-साथ नहीं चल सकते?

उत्तराखंड । देश के कई हिस्सों में विकास परियोजनाओं के लिए बड़ी संख्या में पेड़ों की कटाई की जा रही है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विकास की कीमत हमारी प्राकृतिक धरोहर चुकाएगी?

जल, जंगल और ज़मीन किसी भी सभ्यता की सबसे बड़ी पूंजी हैं। पेड़ केवल लकड़ी या हरियाली नहीं, बल्कि हमारी साँसों का आधार हैं। यही हमें ऑक्सीजन देते हैं, बारिश के चक्र को संतुलित रखते हैं, भूजल स्तर बनाए रखने में मदद करते हैं, तापमान नियंत्रित करते हैं और असंख्य जीव-जंतुओं का आश्रय भी हैं।

यदि इसी तरह अंधाधुंध पेड़ों की कटाई जारी रही और पर्यावरण संरक्षण को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, तो आने वाले वर्षों में इसके गंभीर परिणाम देखने पड़ सकते हैं। बढ़ता प्रदूषण, भीषण गर्मी, जल संकट, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा लगातार बढ़ सकता है। आने वाली पीढ़ियाँ हमसे सवाल करेंगी कि हमने उनके हिस्से की हरियाली क्यों छीन ली।

विकास आवश्यक है, लेकिन ऐसा विकास जो प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चले। सड़कें, पुल, रेलवे लाइनें और अन्य परियोजनाएँ देश की जरूरत हैं, मगर इनके साथ पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है। जहाँ पेड़ों की कटाई अपरिहार्य हो, वहाँ वैज्ञानिक तरीके से पर्याप्त संख्या में नए पेड़ लगाए जाएँ और उनकी देखभाल भी सुनिश्चित की जाए।

सिर्फ़ पौधे लगाकर तस्वीरें खिंचवाना ही पर्याप्त नहीं है। असली जिम्मेदारी तब पूरी होती है जब वे पौधे बड़े होकर फिर से जंगल बनें। प्रकृति की भरपाई केवल कागज़ों में नहीं, ज़मीन पर दिखाई देनी चाहिए।

याद रखिए—जब आखिरी पेड़ कट जाएगा, आखिरी नदी सूख जाएगी और आखिरी सांस लेने लायक हवा भी प्रदूषित हो जाएगी, तब हमें एहसास होगा कि धन नहीं, प्रकृति ही सबसे बड़ी संपत्ति थी।

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