आत्मरक्षा के साथ फिटनेस, अनुशासन और आत्मविश्वास की सीख, मोबाइल से दूरी बनाकर खेलों से जुड़ रहे बच्चे
बरेली। आज के बदलते दौर में बच्चों और खासकर छात्राओं के लिए आत्मरक्षा का प्रशिक्षण केवल एक खेल नहीं, बल्कि सुरक्षा, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास का महत्वपूर्ण माध्यम बनता जा रहा है। इसी उद्देश्य से लाल फाटक स्थित विमल लॉन में नियमित कराटे प्रशिक्षण चल रहा है, जहां छात्र-छात्राएं उत्साह के साथ कराटे की बारीकियां सीख रहे हैं। प्रशिक्षण के दौरान बच्चों को आत्मरक्षा तकनीकों के साथ फिटनेस, अनुशासन, एकाग्रता और स्वस्थ जीवनशैली के प्रति भी जागरूक किया जा रहा है।

कराटे का अभ्यास करने वाले बच्चों में जहां शारीरिक सक्रियता बढ़ रही है, वहीं छात्राओं में आत्मविश्वास भी देखने को मिल रहा है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सिखाया जाता है कि किसी भी असहज या विपरीत परिस्थिति में घबराने के बजाय सतर्क रहना, आसपास की स्थिति को समझना और अपनी सुरक्षा के लिए उचित कदम उठाना जरूरी है। आत्मरक्षा का उद्देश्य किसी से लड़ाई करना नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थिति में स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए जागरूक और आत्मविश्वासी बनाना है।
कराटे सिर्फ खेल नहीं, जीवन जीने की कला
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी एवं मुख्य कराटे प्रशिक्षक शिहान बाबूराम सिंह ने बताया कि कराटे को केवल मार्शल आर्ट या मुकाबले के रूप में नहीं देखना चाहिए। इसके नियमित अभ्यास से बच्चों में अनुशासन, आत्मविश्वास, एकाग्रता, संतुलन और शारीरिक सक्रियता विकसित करने में मदद मिलती है। कराटे बच्चों को यह भी सिखाता है कि मेहनत, धैर्य और निरंतर अभ्यास से कठिन से कठिन लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि आज के समय में जब बच्चे घंटों मोबाइल फोन, वीडियो गेम और सोशल मीडिया में व्यस्त रहने लगे हैं, ऐसे में उन्हें खेल और शारीरिक गतिविधियों से जोड़ना बेहद जरूरी है। बच्चों के हाथ में हर समय मोबाइल देने के बजाय यदि उन्हें मैदान, खेल और कराटे जैसी गतिविधियों से जोड़ा जाए तो उनकी दिनचर्या अधिक सक्रिय और अनुशासित बन सकती है।
छात्राओं के लिए आत्मरक्षा का प्रशिक्षण बना आत्मविश्वास की ताकत
प्रशिक्षण के दौरान छात्राओं को विशेष रूप से आत्मरक्षा के ऐसे अभ्यास कराए जाते हैं, जिनसे वे संकट की स्थिति में घबराने के बजाय अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रह सकें। कराटे का नियमित अभ्यास शरीर की फुर्ती, संतुलन और समन्वय को बेहतर करने में मदद करता है। इसके साथ ही अभ्यास के दौरान बच्चों को मानसिक रूप से मजबूत रहने, अनुशासन का पालन करने और आत्मविश्वास के साथ अपनी बात रखने के लिए भी प्रेरित किया जाता है।
शिहान बाबूराम सिंह ने कहा कि कराटे सीखने की कोई उम्र नहीं होती। बच्चों को छोटी उम्र से खेल और आत्मरक्षा से जोड़ने पर उन्हें फिटनेस के साथ अनुशासन की आदत भी विकसित करने का अवसर मिलता है। छात्राओं के लिए यह प्रशिक्षण उन्हें अपनी सुरक्षा के प्रति जागरूक बनाने के साथ आत्मविश्वास बढ़ाने में भी सहायक हो सकता है।
मोबाइल छोड़ो, मैदान से नाता जोड़ो
कराटे प्रशिक्षण के दौरान बच्चों को स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और अनुशासित दिनचर्या के लिए भी प्रेरित किया जा रहा है। बच्चों को समझाया जा रहा है कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए केवल पढ़ाई ही नहीं, बल्कि खेल और व्यायाम के लिए भी समय निकालना जरूरी है।
बच्चों को मोबाइल और स्क्रीन पर अनावश्यक समय बिताने से बचने तथा खाली समय में खेलकूद, व्यायाम और रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होने का संदेश दिया जा रहा है। प्रशिक्षण के दौरान बच्चे नियमित अभ्यास के साथ एक-दूसरे का सहयोग करना, प्रशिक्षक का सम्मान करना और अनुशासन का पालन करना भी सीख रहे हैं।
कराटे से बढ़ रहा बच्चों का आत्मविश्वास
प्रशिक्षण में शामिल बच्चों का कहना है कि कराटे सीखने से उन्हें अपने शरीर को सक्रिय रखने के साथ नई चीजें सीखने का अवसर मिल रहा है। नियमित अभ्यास से उनमें आत्मविश्वास और अनुशासन की भावना बढ़ रही है। प्रशिक्षण के दौरान तनिष्क, सोनम, पीहू, रुद्र, शिवा, आयुष, श्रद्धा और साक्षी सहित कई छात्र-छात्राएं नियमित रूप से अभ्यास कर रहे हैं।
लाल फाटक स्थित विमल लॉन में चल रहा यह कराटे प्रशिक्षण बच्चों को केवल दांव-पेंच सिखाने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें आत्मरक्षा, फिटनेस, अनुशासन और आत्मविश्वास से जोड़ने का प्रयास भी है। आज के दौर में जब अभिभावक बच्चों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और मोबाइल की बढ़ती आदत को लेकर चिंतित रहते हैं, ऐसे में कराटे जैसी खेल गतिविधियां बच्चों को सक्रिय और आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक उपयोगी कदम हो सकती हैं।


