गुस्ताख–ए–नबी की एक सजा संविधान के दायरे में नहीं, पुलिस की मजबूत केस डायरी ने रोकी आरोपी की जमानत

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प्रयागराज। बरेली के संवेदनशील प्रकरण में हाईकोर्ट ने आरोपी रेहान की जमानत अर्जी को खारिज करते हुए कहा कि भारत का संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार देता है, लेकिन इसके साथ स्पष्ट संवैधानिक सीमाएँ भी जुड़ी हैं। अदालत ने कहा कि हिंसात्मक या दहशत फैलाने वाले नारों का उपयोग कानून-व्यवस्था के लिए खतरा माना जा सकता है।

पुलिस की मजबूत केस डायरी ने रोकी जमानत

सूत्रों के अनुसार इस बार पुलिस ने पूरी तैयारी के साथ केस डायरी प्रस्तुत की। एसएसपी अनुराग आर्य ने विवेचना की नियमित समीक्षा की और मामले को मजबूत आधार देने के निर्देश दिए। सीओ प्रथम  शिवम आशुतोष और इंस्पेक्टर संजय धीर को केस से संबंधित पक्ष रखने के लिए प्रयागराज भेजा गया था। वापस लौटने के बाद इन्होंने  बताया कि केस डायरी में वीडियो फुटेज, अखबार की कटिंग, निष्पक्ष गवाहों के बयान और 19 से 26 सितंबर तक की कथित साजिश का विवरण शामिल किया गया। अदालत ने इन्हें जमानत खारिज करने के लिए पर्याप्त माना।

विवेचक संजय धीर की मजबूत केस डायरी और सीओ प्रथम शिवम् आशुतोष की मजबूत पैरवी ने रोकी आरोपी की जमानत 

अदालत की टिप्पणियाँ

अदालत ने हिंसक नारेबाजी के संदर्भ में कहा कि कुछ नारों का उद्भव भारत की सांस्कृतिक या धार्मिक परंपराओं से नहीं जुड़ा, बल्कि पड़ोसी देशों के ईशनिंदा कानूनों और वहां हुई घटनाओं से प्रभावित माना जाता है।

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि धार्मिक जयकारे अपने आप में अपराध नहीं हैं। लेकिन यदि किसी नारे का प्रयोग दुर्भावनापूर्ण तरीके से किसी को भयभीत करने, हिंसा भड़काने या कानून को चुनौती देने के उद्देश्य से किया जाए, तो ऐसी स्थितियों में वह दंडनीय हो सकता है।अदालत ने कहा कि किसी भी भीड़ द्वारा कानून अपने हाथ में लेकर किसी व्यक्ति के विरुद्ध हिंसक दंड की मांग करना, सीधे तौर पर कानून के शासन के विपरीत है।

 

पुलिस कार्रवाई की सराहना

एसएसपी अनुराग आर्य ने बताया कि अदालत ने बरेली पुलिस व प्रशासन की जांच व कार्रवाई की सराहना की है।

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