भूमि विवाद में लेखपाल पर रिश्वत और धमकी के गंभीर आरोप, एफआईआर दर्ज

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बरेली: उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के अलीगंज थाना क्षेत्र में एक गंभीर भूमि विवाद और भ्रष्टाचार का मामला सामने आया है। शिकायतकर्ता श्री यादराम, निवासी ग्राम हाफिजगंज, ने आरोप लगाया है कि लेखपाल तजेपाल गंगवार और अन्य आरोपियों ने फर्जी पट्टे तैयार कर उनकी जमीन हड़पने की कोशिश की। इसके अलावा, लेखपाल पर दो लाख रुपये रिश्वत मांगने और शिकायतकर्ता को झूठे मुकदमों में फंसाने की धमकी देने के आरोप भी लगे हैं।

 

इस मामले में न्यायालय के आदेश के बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की है।

 

मामले की पृष्ठभूमि: क्या है विवाद?

शिकायतकर्ता यादराम और उनके सह-भूस्वामी (ब्रह्मपाल, नेकपाल सिंह, ओमवीर सिंह आदि) ग्राम हाफिजगंज, अलीगंज, तहसील आंवला, जिला बरेली में संविधानिक भू-स्वामी हैं। उनके पास 180, 87 और 85 नंबर की कृषि योग्य भूमि है, जो पीढ़ियों से उनके परिवार के नाम पर चली आ रही है।

 

लेकिन, लेखपाल तजेपाल गंगवार पर आरोप है कि उसने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए फर्जी पट्टे तैयार कर ज़मीन का स्वामित्व बदलने की कोशिश की। इस मामले को लेकर सिविल जज (आंवला) की अदालत में एक मुकदमा विचाराधीन है, साथ ही उपजिलाधिकारी (एसडीएम) आंवला के न्यायालय में भी धारा 144 (उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता) के तहत मामला लंबित है।

 

शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन मुकदमों के बावजूद, लेखपाल तजेपाल गंगवार ने पुलिस के सहयोग से उनके और उनके सह-भूस्वामियों पर दबाव बनाने की कोशिश की।

 

लेखपाल पर रिश्वत मांगने और धमकाने के आरोप

शिकायतकर्ता श्री यादराम ने आरोप लगाया कि लेखपाल तजेपाल गंगवार ने 2 लाख रुपये की रिश्वत की मांग की और पैसे न देने पर झूठे मुकदमे दर्ज कराने और जमीन पर जबरन कब्जा करने की धमकी दी।

 

फोन पर धमकी देने के सबूत

एफआईआर में दर्ज विवरण के अनुसार, लेखपाल ने कई बार फोन करके शिकायतकर्ता और उनके सह-भूस्वामियों को धमकाया:

26 नवंबर 2024 को रात 8:30 बजे

1 दिसंबर 2024 को सुबह 7:14 बजे

3 दिसंबर 2024 को अलग-अलग समय पर कई बार

4 दिसंबर 2024 को शाम 4:50 बजे

लेखपाल ने कथित तौर पर कहा:

“अगर तुमने पैसे नहीं दिए, तो तुम्हारे खिलाफ फर्जी मुकदमे दर्ज करवाकर जेल भिजवा दूँगा और ज़मीन पर जबरन कब्जा कर लूँगा।”

 

शराब के नशे में घर में घुसकर गाली-गलौज

इसके अलावा, आरोप यह भी है कि आरोपी शंकर लाल (जो कथित रूप से लेखपाल के करीबी हैं) शराब पीकर शिकायतकर्ता के घर घुस आया, गाली-गलौज की और परिवार की महिलाओं को भी अपशब्द कहे।

 

शिकायतकर्ता ने कहा कि “शंकर लाल ने खुलेआम कहा कि तजेपाल गंगवार के साथ सारा शासन है, और जमीन खाली कराने में देर नहीं लगेगी।”

पढ़ें एफआईआर:https://online.fliphtml5.com/mskht/ncpa/

पुलिस की निष्क्रियता: अधिकारियों से शिकायत के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई

लेखपाल और अन्य आरोपियों के खिलाफ शिकायतकर्ता ने पहले ही बरेली के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP), पुलिस महानिरीक्षक (IG) और अलीगंज थाना प्रभारी को लिखित शिकायतें भेजीं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे परेशान होकर शिकायतकर्ता ने न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने पुलिस को एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया।

 

किन धाराओं में मामला दर्ज हुआ?

इस गंभीर मामले में पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज किया:

धारा 333 – सरकारी कार्य में बाधा डालने और हिंसा करने का आरोप।

धारा 352 – धमकी देने और हमला करने का आरोप।

धारा 351(3) – जान से मारने की धमकी देने का मामला।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 – सरकारी कर्मचारी (लेखपाल) द्वारा रिश्वत माँगने का आरोप।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 12 – सरकारी कर्मचारी द्वारा अवैध लाभ लेने का मामला।

अब आगे क्या?

एफआईआर दर्ज होने के बाद पुलिस ने मामले की जांच उप पुलिस अधीक्षक (CO आंवला) को सौंप दी है।

हालांकि, शिकायतकर्ता और उनके परिवार को डर है कि आरोपी प्रभावशाली हैं और पुलिस से मिलीभगत कर सकते हैं। इसलिए उन्होंने सरकार और प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की है।

 

इस केस का व्यापक प्रभाव

यह मामला केवल एक भूमि विवाद तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही को भी उजागर करता है।

अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार का गंभीर उदाहरण होगा।

पुलिस की निष्क्रियता से यह साफ है कि प्रभावशाली लोगों के खिलाफ आम नागरिकों की आवाज दबाई जा रही है।

इस केस से अन्य किसानों और भूमि मालिकों के लिए भी एक बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या सरकारी अधिकारी और राजस्व विभाग निष्पक्ष रूप से काम कर रहे हैं या नहीं?

अब देखना यह होगा कि क्या पुलिस निष्पक्ष जांच कर आरोपियों पर कड़ी कार्रवाई करेगी, या फिर मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव में ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?

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