रमजान के आखिरी अशरे की फजीलत, आलम में अमन व सलामती के लिए दुआ

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उस्मान अली

भास्कर टूडे, मेरठ। जमीअत उलेमा जिला मेरठ के नायब सदर और क़िला परीक्षितगढ़ स्थित मुस्तफाई मस्जिद के इमाम, क़ारी मुहम्मद वासिफ वाजिदी साहब ने रमजान के आखिरी अशरे की अहमियत और उसकी फजीलत पर विस्तार से रोशनी डाली। उन्होंने कहा कि रमजान का आखिरी अशरा बेहद बरकतों और रहमतों वाला होता है। इसी अशरे में शब-ए-कद्र जैसी अजीम रात आती है, जिसके बारे में कुरआन शरीफ में बताया गया है कि यह रात हजार महीनों से बेहतर है। इसलिए मुसलमानों को चाहिए कि इन दिनों में ज्यादा से ज्यादा इबादत, नमाज, कुरआन की तिलावत, जिक्र व अज़कार और दुआओं का एहतमाम करें।

क़ारी मुहम्मद वासिफ वाजिदी साहब ने कहा कि रमजान का महीना इंसान को सब्र, तकवा और नेकी की राह पर चलना सिखाता है। खास तौर पर आखिरी अशरे में अल्लाह तआला अपने बंदों पर खास रहमतें नाज़िल करता है और बंदों की तौबा व दुआओं को कुबूल फरमाता है। उन्होंने कहा कि इन दिनों में इबादत करने से गुनाह माफ होते हैं, दिल को सुकून मिलता है और इंसान के अंदर अच्छाई व परहेजगारी बढ़ती है।

उन्होंने बताया कि रमजान के आखिरी अशरे में एतिकाफ, सदका-खैरात और जरूरतमंदों की मदद करने का भी खास सवाब मिलता है। इस दौरान की गई इबादत इंसान की जिंदगी में बरकत लाती है और अल्लाह की रहमत का जरिया बनती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे इन मुबारक दिनों में ज्यादा से ज्यादा नेक काम करें और समाज में भाईचारे व मोहब्बत को बढ़ावा दें। उन्होंने ईद-उल-फितर के ताल्लुक से कहा कि यह त्योहार रोजों और इबादतों के बाद मिलने वाली खुशी और अल्लाह का शुक्र अदा करने का दिन होता है। ईद हमें आपसी मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत का पैगाम देती है। उन्होंने कहा कि ईद से पहले सदका-ए-फितर अदा करना जरूरी है, ताकि गरीब और जरूरतमंद लोग भी ईद की खुशियों में बराबर के शरीक हो सकें और समाज में बराबरी और हमदर्दी का माहौल कायम रहे।

कार्यक्रम के आखिर में देश और दुनिया में अमन-ओ-अमान, भाईचारे और इंसानियत की भलाई के लिए खास दुआ की गई। अल्लाह तआला पूरी दुनिया में शांति कायम करे, लोगों के दिलों में मोहब्बत पैदा करे और इंसानियत को हर तरह की मुसीबतों और परेशानियों से महफूज रखे।

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