बीमारी के ढाँचे का विस्तार नहीं, रोगों की रोकथाम: भारत के लिए एक सार्वजनिक स्वास्थ्य अनिवार्यता

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भास्कर टूडे। भारत में आज मेडिकल कॉलेजों और बड़े अस्पतालों की संख्या तेजी से बढ़ाई जा रही है। सरकारी नीतियाँ स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने पर केंद्रित हैं। यह कदम पहली दृष्टि में उचित प्रतीत होता है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है—
क्या हम स्वास्थ्य संकट के मूल कारण को संबोधित कर रहे हैं, या केवल अस्वस्थ समाज के परिणामों का इलाज करने के लिए व्यवस्था का विस्तार कर रहे हैं? देश भर में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा, अवसाद और अन्य मेटाबोलिक रोगों जैसे जीवनशैली से जुड़ी बीमारियाँ तेजी से बढ़ रही हैं। ये रोग अब केवल शहरी या बुजुर्ग आबादी तक सीमित नहीं हैं। अब ये युवा वर्ग, ग्रामीण समाज और यहाँ तक कि किशोरों को भी प्रभावित कर रहे हैं। जैसे-जैसे मरीजों की संख्या बढ़ रही है, वैसे-वैसे दवा कंपनियाँ इन बीमारियों और उनकी जटिलताओं को नियंत्रित करने के लिए नए-नए साल्ट और महंगी दवाएँ बाजार में ला रही हैं।
यह प्रवृत्ति एक चिंताजनक सच्चाई को दर्शाती है—हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था रोगों की रोकथाम के बजाय रोग प्रबंधन पर अधिक केंद्रित होती जा रही है।
बढ़ते मेडिकल ढाँचे का विरोधाभास
सरकार द्वारा नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने का उद्देश्य स्वास्थ्य पेशेवरों की संख्या बढ़ाना है। लेकिन यदि जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों की दर लगातार बढ़ती रही, तो देश में हमेशा डॉक्टरों, अस्पतालों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी बनी रहेगी। चाहे हम कितने भी अस्पताल बना लें और कितने भी डॉक्टर तैयार कर लें, यदि बीमारियों के मूल कारणों को नहीं रोका गया तो मांग हमेशा आपूर्ति से अधिक ही रहेगी। स्वास्थ्य व्यवस्था केवल बीमारी का इलाज करने वाली प्रणाली नहीं होनी चाहिए, बल्कि ऐसी प्रणाली होनी चाहिए जो बीमारियों को होने से पहले ही रोकने को प्राथमिकता दे।
केवल लक्षण नहीं, कारण का उपचार
आधुनिक चिकित्सा को एक मूल सिद्धांत की ओर लौटना होगा: पहले सही निदान स्थापित करें, रोग के कारण को समझें और उसके अनुसार उपचार प्रारम्भ करें। दुर्भाग्य से वर्तमान प्रणाली में अक्सर केवल लक्षणों को दबाने पर ध्यान दिया जाता है, जबकि जीवनशैली के मूल कारणों को नहीं सुधारा जाता। मधुमेह के मरीज दवाएँ लेते रहते हैं लेकिन अस्वस्थ भोजन जारी रखते हैं। उच्च रक्तचाप के मरीज गोलियाँ लेते हैं लेकिन निष्क्रिय जीवनशैली और अत्यधिक नमक का सेवन जारी रहता है। मोटापे का इलाज दवाओं से किया जाता है, जबकि शारीरिक गतिविधि की कमी और गलत खान-पान जारी रहता है। परिणामस्वरूप, दवाओं के बढ़ते उपयोग के बावजूद *बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।
जीवनशैली रोग: एक राष्ट्रीय सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती
भारत के उभरते स्वास्थ्य संकट के वास्तविक कारण स्पष्ट हैं—
• *अत्यधिक नमक, चीनी और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का सेवन*
• *निष्क्रिय जीवनशैली और शारीरिक गतिविधि की कमी*
• *मोटापे की बढ़ती दर*
• *तनाव और नींद से जुड़ी समस्याएँ*
• *सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता की कमी*
• *बचपन से ही अस्वस्थ खान-पान की आदतें*
ये सभी कारक मिलकर गैर-संक्रामक रोगों (NCDs) की महामारी को जन्म दे रहे हैं।यदि इन कारणों को दूर करने के लिए मजबूत राष्ट्रीय रणनीति नहीं बनाई गई, तो भारत एक ऐसा देश बन सकता है जो जीवनभर दवाओं और दीर्घकालिक रोग प्रबंधन पर निर्भर रहेगा।
रोकथाम को राष्ट्रीय नीति बनाना होगा
अब समय आ गया है कि नीति-निर्माता यह समझें कि रोकथाम आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था, उपचार आधारित व्यवस्था से कहीं अधिक प्रभावी और किफायती होती है।केवल नए मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय सरकार को समग्र निवारक स्वास्थ्य रणनीति अपनानी चाहिए।
 1. राष्ट्रीय जीवनशैली सुधार अभियान
देशभर में व्यापक जागरूकता अभियान चलाकर लोगों को स्वस्थ भोजन, कम नमक सेवन, नियमित व्यायाम और तनाव प्रबंधन के बारे में शिक्षित किया जाना चाहिए।
2. *विद्यालय स्तर पर स्वास्थ्य शिक्षा*
स्वस्थ खान-पान, नियमित व्यायाम और रोगों की रोकथाम को स्कूलों के पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। स्वास्थ्य जागरूकता बचपन से ही शुरू होनी चाहिए।
3. *प्रोसेस्ड और उच्च नमक वाले खाद्य पदार्थों का नियमन*
पैकेज्ड खाद्य पदार्थों में अत्यधिक नमक, चीनी और अस्वस्थ तत्वों को नियंत्रित करने के लिए सख्त नीतियाँ बनानी चाहिए। खाद्य लेबलिंग स्पष्ट और प्रभावी होनी चाहिए।
4. *शारीरिक गतिविधि को बढ़ावा*
शहरों और कस्बों की योजना में पैदल चलने, साइकिल चलाने और व्यायाम के लिए सार्वजनिक स्थानों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
 5. *प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना*
प्राथमिक स्वास्थ्य प्रणाली को केवल दवा देने तक सीमित न रखकर *स्क्रीनिंग, परामर्श और जीवनशैली मार्गदर्शन* पर अधिक जोर देना चाहिए।
 *संख्या नहीं, गुणवत्ता पर जोर*
डॉक्टरों की संख्या बढ़ाना महत्वपूर्ण है, लेकिन *गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं होना चाहिए।*
पर्याप्त आधारभूत संरचना, अनुभवी फैकल्टी और प्रशिक्षण मानकों के बिना तेजी से मेडिकल कॉलेज खोलने से कम प्रशिक्षित पेशेवर तैयार होने का खतरा है।
भारत को सुनिश्चित करना होगा कि—
• मेडिकल कॉलेज *उच्च शैक्षणिक मानकों* का पालन करें
• अस्पताल *उत्तम क्लिनिकल प्रशिक्षण* प्रदान करें
• डॉक्टरों को *निवारक चिकित्सा और सार्वजनिक स्वास्थ्य* का प्रशिक्षण मिले
लक्ष्य केवल *अधिक डॉक्टर तैयार करना नहीं*, बल्कि *बेहतर डॉक्टर तैयार करना* होना चाहिए जो समाज को स्वस्थ जीवनशैली की दिशा में मार्गदर्शन दे सकें।
*स्वास्थ्य सोच में राष्ट्रीय परिवर्तन*
भारत आज एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यदि वर्तमान प्रवृत्ति जारी रही तो—
• स्वास्थ्य खर्च बढ़ता जाएगा
• दवाओं पर निर्भरता बढ़ेगी
• अस्पतालों पर बोझ बढ़ेगा
• दीर्घकालिक रोगियों की संख्या बढ़ती जाएगी
लेकिन यदि रोकथाम और जीवनशैली सुधार को प्राथमिकता दी जाए, तो देश में बीमारियों का बोझ काफी हद तक कम किया जा सकता है।
अब समय आ गया है कि स्वास्थ्य नीति का केंद्र *बीमारियों का उपचार नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज का निर्माण* बने।
यदि हम आज *बीमारियों के मूल कारणों* पर काम करेंगे, तो कल लाखों बीमारियों को होने से रोका जा सकता है।
प्रो० (डॉ०) अनिल नौसरान
सीनियर हीमैटोपैथोलॉजिस्ट
पब्लिक हेल्थ एडवोकेट
संस्थापक – **Cyclomed Fit India**
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