“बिजली चोरी पर राहत: क्या ये न्याय है या विशेषाधिकार?”

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“बिजली चोरी पर राहत: क्या ये न्याय है या विशेषाधिकार?”


“बिजली चोरी करो और मौज करो” — यह कटाक्ष अब सच्चाई के काफी करीब लगने लगा है। हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा सांसद जियाउर रहमान बर्क को बिजली चोरी के एक गंभीर मामले में दी गई अंतरिम राहत ने एक नई बहस छेड़ दी है: क्या हमारे देश की न्याय व्यवस्था आम नागरिक और प्रभावशाली नेताओं के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाती है?

 

बर्क पर बिजली विभाग ने 12 वर्षों तक 16 किलोवाट बिजली के अवैध उपयोग के लिए ₹1.91 करोड़ की पेनल्टी लगाई थी। यह कार्रवाई न केवल नियमों के तहत थी, बल्कि एक स्पष्ट संदेश भी थी कि कोई भी कानून से ऊपर नहीं है। लेकिन जस्टिस सौमित्र दयाल और जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने इस मांग को “मनमाना” (Arbitrary) बताते हुए रोक लगा दी।

 

हाई कोर्ट ने यह तर्क दिया कि भले ही बिजली चोरी हुई हो, पर विभाग 12 सालों का आकलन नहीं कर सकता, केवल एक साल तक का ही बिल वैध है। साथ ही बर्क को सिर्फ ₹6 लाख जमा करने के आदेश दिए गए और बिजली सप्लाई भी बहाल करने को कहा गया। विभाग से जवाब मांगा गया है, लेकिन अगली सुनवाई अब 2 जुलाई को होगी।

आम और खास में फर्क क्यों?

यह सवाल हर आम नागरिक को चुभता है। एक सामान्य उपभोक्ता अगर एक महीने का बिल भी जमा न करे, तो बिजली विभाग उसी हफ्ते बिजली काट देता है। कुछ साल पहले, मेरे खुद के घर में लोड अचानक बढ़ा, तो तुरंत विभाग के अधिकारी जांच करने पहुंचे थे। लेकिन यहां 12 वर्षों तक अवैध खपत होती रही और विभाग “साहब” के खिलाफ कार्रवाई से बचता रहा।

क्या यह लोकतंत्र में समानता है?

अदालती दृष्टिकोण पर प्रश्न

हाई कोर्ट का यह तर्क कि केवल एक साल का आकलन किया जा सकता है, कानून के किस प्रावधान पर आधारित है, यह स्पष्ट नहीं है। अगर कोई व्यक्ति वर्षों तक चोरी करता रहा है, तो उसे सिर्फ एक साल के नुकसान की भरपाई करने देना, न्याय नहीं बल्कि दोषियों को इनाम देना है।

क्या अदालतें अब ऐसे निर्णयों के माध्यम से जनप्रतिनिधियों को बिजली चोरी के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं?

क्या यह “प्रिविलेज” (विशेषाधिकार) नहीं है, जिसे कानून के समक्ष समानता के सिद्धांत का उल्लंघन नहीं माना जाना चाहिए?

सरकार की जिम्मेदारी और सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

उत्तर प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह इस निर्णय के खिलाफ शीघ्र ही सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करे। 1.91 करोड़ की पेनल्टी को मनमाना ठहराना एक खतरनाक मिसाल बन सकती है।

 

हाल ही में यूपी सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कानून व्यवस्था पर सख्ती की तारीफ की जा रही थी, लेकिन इस मामले में हाई कोर्ट का फैसला उनके प्रशासन पर सीधा प्रहार है। CJI बी.आर. गवई और सर्वोच्च न्यायालय को इस पर ध्यान देना चाहिए ताकि न्याय व्यवस्था की निष्पक्षता और भरोसे को बरकरार रखा जा सके।

क्या हमें उम्मीद है?

सवाल यह नहीं है कि जियाउर रहमान बर्क कौन हैं। सवाल यह है कि क्या कोई भी नागरिक 12 साल तक बिजली चोरी करता रहे और फिर अदालत कहे कि सिर्फ एक साल का ही हिसाब लिया जा सकता है? अगर बर्क को यह छूट दी जा सकती है, तो फिर करोड़ों साधारण उपभोक्ताओं को हर महीने समय पर बिल जमा करने की आवश्यकता क्यों हो?

 

यह मामला सिर्फ बिजली चोरी का नहीं है, यह भारत की न्यायिक और प्रशासनिक संरचना के दोहरे मापदंडों का आईना है। अगर कानून का डर सिर्फ आम आदमी के लिए रह गया है, और नेता नियमों से ऊपर माने जाते हैं, तो यह लोकतंत्र की नींव को हिला देने वाली बात है।लोकतंत्र तभी बचेगा जब न्याय सभी के लिए एक समान होगा – बिना नाम, पद और पहुँच के आधार पर भेदभाव के।


लेखक: गिरीश त्यागी 

पूर्व जिलाध्यक्ष, भारतीय जनता पार्टी, अमरोहा


 

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