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बरेली। शुक्रवार की शाम बरेली के कुतुबखाना पुल पर एक बार फिर चाइनीज मांझे ने अपनी खौफनाक मौजूदगी दर्ज की। बिलवा कृषि विभाग कार्यालय में तकनीकी सहायक के पद पर कार्यरत मयंक यादव, जो बरेली के निवासी हैं, इस जानलेवा मांझे की चपेट में आकर गंभीर रूप से घायल हो गए। उनकी गर्दन कटते-कटते बची, लेकिन उंगली की नस कटने से वह खून से लथपथ हो गए। स्थानीय लोगों की मदद से उन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल ले जाया गया, जहां उनकी हालत अब स्थिर बताई जा रही है।
मयंक ने बताया कि वह शुक्रवार को अपने कार्यालय से घर लौट रहे थे। रास्ते में किसी जरूरी काम से वह कुतुबखाना की ओर गए। शाम करीब 5 बजे जब वह कुतुबखाना पुल पर अपनी बाइक से चढ़ रहे थे, तभी अचानक उनकी आंखों के सामने चाइनीज मांझा लटकता दिखा। मयंक ने तुरंत सूझबूझ दिखाई और अपनी गर्दन को झटके से नीचे किया, जिससे वह बाल-बाल बच गए। लेकिन मांझे ने उनकी उंगली को बुरी तरह काट दिया, जिससे नस कट गई और खून बहने लगा। मयंक ने कहा, “पलक झपकते ही मैंने गर्दन बचा ली, वरना मेरी जान जा सकती थी। लेकिन उंगली की नस कटने से बहुत दर्द हुआ और खून रुक नहीं रहा था।”
स्थानीय लोगों ने तुरंत मयंक को बाइक से उतारा और प्राथमिक उपचार के बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाया। मयंक के इस हादसे ने एक बार फिर चाइनीज मांझे के खतरे को उजागर कर दिया है, जो बरेली की सड़कों पर किसी साइलेंट किलर की तरह मौजूद है।
चाइनीज मांझा: मौत का जाल
चाइनीज मांझा, जो नायलॉन और शीशे जैसे धारदार केमिकलों से बना होता है, अपनी मजबूती और काटने की क्षमता के लिए कुख्यात है। यह मांझा पतंगबाजी के बाद सड़कों, बिजली के तारों और पेड़ों पर लटक जाता है, जिससे दोपहिया वाहन चालकों के लिए जानलेवा खतरा पैदा होता है। बरेली में हाल के वर्षों में चाइनीज मांझे की चपेट में कई लोग घायल हुए हैं, और कुछ ने तो अपनी जान तक गंवा दी। हाल ही में भदौली गांव के मिथिलेश कुमार वर्मा की गर्दन मांझे से कट गई थी, जिन्हें जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके अलावा, पुलिसकर्मियों सहित कई लोग इस मांझे का शिकार बन चुके हैं।
प्रशासन की नाकामी, बिक्री पर क्यों नहीं लग रही रोक?
बरेली प्रशासन ने चाइनीज मांझे की बिक्री और उपयोग पर प्रतिबंध लगाने के लिए कई बार अभियान चलाए हैं। जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधिकारियों ने दुकानदारों और कारोबारियों को सख्त चेतावनी दी है कि मांझे की बिक्री पर कड़ी कार्रवाई होगी। इसके बावजूद, शहर के बाजारों में चाइनीज मांझा आसानी से उपलब्ध है। कुछ पतंग विक्रेताओं ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि चाइनीज मांझे पर प्रतिबंध के बाद अब देसी शीशे वाला मांझा भी बिक रहा है, जो चाइनीज मांझे जितना ही खतरनाक है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की सख्ती केवल त्योहारों जैसे बसंत पंचमी के दौरान दिखती है, लेकिन बाकी समय निगरानी ढीली पड़ जाती है। मयंक के पड़ोसी और स्थानीय निवासी राकेश शर्मा ने गुस्से में कहा, “हर साल हादसे हो रहे हैं, लेकिन प्रशासन कुछ नहीं करता। मांझा बिक रहा है, और सड़कों पर लटक रहा है। आखिर कितने लोग और घायल होंगे?”
कुतुबखाना पुल के आसपास रहने वाले लोग और मयंक के परिजन इस घटना से आक्रोशित हैं। उनका कहना है कि प्रशासन की लापरवाही के चलते मयंक जैसे लोग इस खतरनाक मांझे का शिकार बन रहे हैं। मयंक की बहन ने रोते हुए कहा, “मेरे भाई की जान बच गई, लेकिन अगर प्रशासन अब भी नहीं जागा, तो और लोग मरेंगे।” स्थानीय लोग मांग कर रहे हैं कि चाइनीज मांझे की बिक्री पर सख्ती से रोक लगे, पतंगबाजी के लिए कड़े नियम बनाए जाएं, और सड़कों पर लटक रहे मांझे को हटाने के लिए नियमित सफाई अभियान चलाया जाए।
चाइनीज मांझे से होने वाले हादसे न केवल बरेली, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुके हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण जरूरी है:
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बिक्री पर पूर्ण प्रतिबंध: चाइनीज मांझे और धारदार देसी मांझे की बिक्री पर सख्ती से रोक लगाई जाए। इसके लिए बाजारों में नियमित छापेमारी और दुकानदारों पर भारी जुर्माना लगाया जाए।
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जागरूकता अभियान: स्कूलों, कॉलेजों और सार्वजनिक स्थानों पर चाइनीज मांझे के खतरों के बारे में जागरूकता फैलाई जाए।
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पतंगबाजी के लिए नियम: पतंगबाजी के लिए सुरक्षित स्थानों को चिह्नित किया जाए और खुले इलाकों में इसे प्रतिबंधित किया जाए।
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सड़कों की सफाई: बिजली विभाग और नगर निगम को सड़कों, तारों और पेड़ों पर लटके मांझे को हटाने के लिए नियमित अभियान चलाना चाहिए।
मयंक यादव का हादसा एक चेतावनी है कि चाइनीज मांझा अब केवल पतंगबाजी का साधन नहीं, बल्कि सड़कों पर मौत का जाल बन चुका है। प्रशासन को केवल कागजी कार्रवाई और मौसमी सख्ती से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। यदि समय रहते कार्रवाई नहीं हुई, तो मयंक जैसे और लोग इस साइलेंट किलर का शिकार बनते रहेंगे। बरेली की जनता अब जवाब चाहती है—आखिर कब रुकेगा यह खूनी खेल?

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